मनुष्य होने का परम् लक्ष्य निरंकार को जानना
नेक्स्ट न्यूज हिमाचल ब्यूरो
सुंदरनगर 22 मई,2022
स्वास" इस जीवन में आत्मा की पहचान करके परमात्मा की प्राप्ति की जा सकती है। जब हमें यह ज्ञात हो जाता है कि हमारी आत्मा इस परमपिता परमात्मा का ही अंश है तब हमारी वास्तविक भक्ति का आरंभ हो जाता है। यह प्रतिपादन सतगुरू माता सुदीक्षा जी महाराज ने आज 22 मई को रेस्ट मेला ग्राउंड, जवाहर पार्क, सुंदरनगर में आयोजित विशाल निरंकारी संत समागम में व्यक्त किए।
सतगुरू माता जी ने अपने पावन प्रवचनों में कहा की ब्रह्मज्ञान द्वारा इस परमात्मा की पहचान जब हो जाती है तो फिर सभी के प्रति केवल प्रेम का भाव ही मन में उत्पन्न होता है। ईर्षा, द्वेष,वैर की भावना मन से स्वयं ही समाप्त हो जाती है। जिस प्रकार आग लगने पर उसे पानी से ही बुझाया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार से मन की नफरत, गलत धारणा को केवल प्रेम के द्वारा ही दूर किया जा सकता है न की किसी के साथ बुरा व्यवहार करके। इसलिए इस ब्रह्मज्ञान की ज्योति रूपी प्रेम की भावना को केवल स्वयं तक सीमित न रखकर समस्त संसार तक पहुंचाना है जिससे सभी के दिलो में प्रेम का ही भाव हो।
सतगुरू माता जी ने अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित होने के भाव का ज़िक्र करते हुए बताया कि गृहस्थ एवम समाज में रहते हुए अपने कर्तव्यों को निभाना ही भक्ति है, उसे बीच में छोड़ देना भक्ति नहीं जैसे यदि कोई फोज मैं है और अपनी ड्यूटी को छोड़कर बीच में ही भाग जाए तो यह कार्य सराहनीय नहीं। वही दूसरी ओर कोई अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाते हुए खड़ा है और उसे अच्छे से निभा रहा है तो उसका यह कार्य सराहनीय है। यही वास्तविक भक्ति है।
मनुष्यता का भाव समझते हुए माता जी ने कहा की हम सभी मनुष्य है। सभी मैं इस एक निरंकार परमात्मा का ही वास है। हम इसकी ही संतान है। इसलिए हमारा यह कर्तव्य बन जाता है कि हम सबके लिए परोपकार की ही भावना मन में रखे। सबके प्रति प्रेम, नम्रता, सहनशीलता जैसे मानवीय गुणों को ही अपनाए। सभी के लिए समर्पित होकर सेवा का भाव मन में लाए। तन, मन और धन से की गई सेवा यदि पूर्ण रूप से समर्पित होकर की जाती है तभी वह सेवा रूपी भक्ति है अन्यथा वह केवल कार्य ही बनकर ही रह जाती है। इसलिए सर्वप्रथम अहंकार का त्याग करें तभी सबके प्रति पूरे मन से समर्पित होकर सेवा कर पाएंगे।
अंत में शाशवत निरंकार का ज़िक्र करते हुए सतगुरू माता जी ने फरमाया की माया हमें सदैव प्रभावित करती रहती है जिसका अस्तित्व केवल थोड़े समय का ही होता है। किंतु इसके विपरीत स्थिरता तो केवल इस परमात्मा में है जो अडिग है, अंनत है, हमेशा शाशवत है। अतः इसे जानकर इससे इकमिक होकर जब हम इससे प्रेम करते है तो हमारे सारे कार्य सहजता से स्वयं ही हो जाते है। मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य इसकी पहचान करना है क्योंकि परमात्मा को जानने का एहसास ही भक्ति है। बाल्यकाल,युवावस्था या फिर वृद्धावस्था हो भक्ति का आरंभ कभी भी किया जा सकता है। हर पल में परमात्मा की पहचान करके भक्ति की जा सकती है। अंत में सतगुरू माता जी ने सभी भक्तों के जीवन के लिए मंगल कामना करी।
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